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रिम्स का कारनामा: 8 हजार में मिल जाते नए बेड, 30 हजार रुपये प्रतिमाह चुका रहे किराया; जानिए पूरा मामला

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रिम्स की पार्किंग में लगाए गए बेड के लिए प्रबंधन ने पिछले दो माह में करीब 1.20 करोड़ रुपये किराये के रूप में दिए हैं। जबकि पिछले दो माह से इस जगह पर संक्रमित मरीज का इलाज नहीं हो रहा। यहां पूरा परिसर खाली पड़ा है। बेड पर धूल जमे हुए हैं। कोरोना की दूसरी लहर के पीक पर रहने के समय इस जगह पर जो बेड लगाए गए वो भाड़े पर लाए गए थे। इसके लिए प्रबंधन हर दिन दो लाख रुपये की दर से किराया दे रहा है। यानी हर माह करीब 60 लाख रुपये का भुगतान किया जा रहा है।

अभी दो माह की ही बात की जाए तो इसके लिए प्रबंधन ने 1.20 करोड़ रुपए का भुगतान किया है। इतना ही नहीं इस सेंटर में अक्टूबर माह तक बेड किराये पर ही रखने का निर्णय लिया है। जबकि इतनी राशि में मरीजों के लिए प्रबंधन खुद का बेड खरीद सकता था। अभी के हिसाब से हर बेड का किराया करीब 30 हजार रुपये से अधिक पड़ रहा है, जबकि एक सामान्य बेड की खरीदारी में आठ से 20 हजार रुपये ही लगते हैं।

मालूम हो कि में रिम्स में रिकार्ड 12 दिनों में ही 330 बेड का अस्थायी कोविड अस्पताल बना दिया गया था। इसका उद्घाटन इसी वर्ष छह मई को किया गया। जिसके बाद यहां पर दूसरी लहर में मरीजों का इलाज किया गया। फिलहाल मरीज के नहीं रहने पर इसे यहां के कुछ कर्मी रहने के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या कहता है रिम्स प्रबंधन

रिम्स के प्रवक्ता डा. डीके सिन्हा बताते हैं कि यहां पर बेड लगाने का मकसद कोरोना मरीजों का इलाज था। दूसरी लहर में यहां मरीजों का काफी इलाज हुआ। बेड की कमी काफी हद तक दूर की गई। लेकिन अब तीसरी लहर आने की आशंका को देखते हुए यहां पर बेड छोड़ा गया है जो करीब सिंतबर तक रहने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि इस बीच काफी किराया देना पड़ रहा है।

रिम्स बेड खरीद भी ले तो इस्तेमाल क्या होगा

डा. डीके सिन्हा का कहना है कि अगर रिम्स बेड खरीद भी लेता है तो उसका बाद में क्या इस्तेमाल होगा, इस पर भी सवाल उठता है। साथ ही अच्छे बेड की कीमत इससे कहीं अधिक पड़ती।

बेड के नाम पर लगा है दो चौकी

दूसरी लहर के पीक पर रहने के दौरान रिम्स के पार्किंग में अस्थायी कोविड वार्ड बनाया गया था। उद्देश्य था कि यहां पर मरीजों का इलाज हो सकेगा। लेकिन यहां पर जो बेड किराये पर लिया गया है वो शादी समारोह में उपयोग किए जाने वाला चौकी है। जिसमें मरीजों को वो आराम नहीं मिल सकता है जिसकी उन्हें जरूरत है। कोविड टास्क फोर्स के अध्यक्ष डा प्रभात कुमार बताते हैं कि जिस तरह की बेड ली गई है वो किसी काम का नहीं है। इसे दूसरी लहर में भले ही जरूरत के लिहाज से लिया गया हो, लेकिन जब संक्रमण थमा तो इसे हटाने या बदलने की व्यवस्था होनी चाहिए थी। इस बेड को फोल्ड कर उठाया नहीं जा सकता, जिससे मरीजों को उठने-बैठने में दिक्कत होगी। जो नियम है उसमें इस तरह के बेड नहीं आते।

बिना किसी नियम के बना दिया गया है अस्थायी कोविड अस्पताल

रिम्स के पार्किंग स्थल पर बिना किसी नियम के कोविड अस्पताल बना दिया गया है। इसे बनाने के लिए जिस रायपुर की कंपनी की मदद ली गई थी, उसके खिलाफ न्यायालय में एक व्यक्ति द्वारा शिकायत की गई है। यहां के डाक्टर बता रहे हैं कि नियमों को ताक पर रख कोई भी प्रक्रिया सही तरीके से नहीं की गई। इसे बनाने के लिए सिर्फ मौखिक आदेश का ही पालन किया गया।

इतना पैसा देने के बाद भी हॉस्पिटल बेड तो मिल नहीं रहा, यह खुशी की बात थोड़े है। कोरोनी की तीसरी लहर की बात चल रही है ऐसे में इन बेड को वापस करना सही नहीं होगा। इसे लेकर कमेटी में चर्चा भी की गई थी। सभी ने फिलहाल एक महीना तक चलाने की बात कही थी। दो महीने पहले विभाग से आगे क्या करना है इस पर राय मांगी गई थी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। संकेत यही मिला कि इसे ही जारी रखा जाए। -डा. कामेश्वर प्रसाद, निदेशक, रिम्स

ऐसे समझें

एक स्टैंडर्ड हॉस्पिटल बेड की कीमत औसतन है 15000

रिम्स ने किराये पर बेड लेकर 1.20 करोड़ चुकाये हैं

यानी इतने रुपये में रिम्स 800 स्टैंडर्ड हॉस्पिटल बेड खरीद लेता

अभी ये है स्थिति

30000 रुपये एक बेड का देना पड़ रहा किराया

सवाल इसलिए उठ रहे

रिम्स के पार्किंग स्थल में बेड के नाम पर चौकी लगा दी गई है। 330 बेड लगाए गए हैं। हॉस्पिटल बेड तो इसे कह ही नहीं सकते। न तो इसे मोड़ सकते हैं न ही ऊपर उठा सकते हैं। सवाल है कि क्या इसके लिए शॉर्ट टेंडर जारी किया गया था। टेंडर जारी भी हुआ तो मानकों का पालन करते हुए हॉस्पिटल बेड क्यों नहीं खरीदे गए।

आगे क्या

अभी सितंबर तक बेड रखने का है निर्णय

यानी अगले एक महीने तक ये बेड रहे तो किराये के रूप में फिर चुकाने होंगे 1.20 लाख

Source : Dainik Jagran

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